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हरिहर स्तोत्रम्

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हरिहर स्तोत्र "हरि" का अर्थ विष्णु भगवान जी से है और "हर" का अर्थ शिव से है. इस स्तोत्र में दोनों का वर्णन किया गया है. गोविन्दमाधवमुकुन्दहरेमुरारे ! शंभो ! शिवेश ! शशिशेखर ! शूलपाणे ! दामोदराच्युत ! जनार्दन ! वासुदेव ! त्याज्या भटा य इति सन्ततमामनन्ति ।।1।। गंगाधरान्धकरिपो ! हर ! नीलकंठ ! वैकुंठ ! कैटभरिपो ! कमठाब्जपाणे ! भूतेश ! खण्डपरशो ! मृड ! चण्डिकेश ! त्याज्या भटा य इति सन्ततमामनन्ति ।।2।। विष्णो ! नृसिंह ! मधुसूदन ! चक्रपाणे ! गौरीपते ! गिरिश ! शंकर ! चन्द्रचूड ! नारायणासुरनिबर्हण ! शांर्गपाणे ! त्याज्या भटा य इति सन्ततमामनन्ति ।।3।। मृत्युंजयोग्रविषमेक्षण ! कामशत्रो ! श्रीकान्त ! पीतवसनाम्बुदनीलशौरे ! ईशान ! कृत्तिवसन ! त्रिदशैकनाथ ! त्याज्या भटा य इति सन्ततमामनन्ति ।।4।। लक्ष्मीपते ! मधुरिपो ! पुरुषोत्तमाद्य ! श्रीकंठ ! दिग्वसन ! शांतपिनाकपाणे ! आनंंदकंद ! धरणीधर ! पद्मनाभ ! त्याज्या भटा य इति सन्ततमामनन्ति ।।5।। सर्वेश्वर ! त्रिपुरसूदन ! देवदेव ! ब्रह्मण्यदेव ! गरुड़ध्वज ! शंखपाणे ! त्र्यक्षोरगाभरणबालमृगांकमौले ! त्याज्या भटा य इति सन्तत...

अग्निदेव के नाम विभिन्न कर्मों में

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  अग्निदेव चित्र साभार(Google) )  गर्भाधान में अग्नि को "मारुत" कहते हैं। पुंसवन में "चन्द्रमा', शुगांकर्म में "शोभन", सीमान्त में "मंगल", जातकर्म में 'प्रगल्भ", नामकरण में "पार्थिव", अन्नप्राशन में 'शुचि", चूड़ाकर्म में "सत्य", व्रतबन्ध (उपनयन) में "समुद्भव", गोदान में "सूर्य", केशान्त (समावर्तन) में "अग्नि", विसर्ग (अर्थात् अग्निहोत्रादिक्रियाकलाप) में "वैश्वानर', विवाह में "योजक", चतुर्थी में "शिखी" धृति में "अग्नि", प्रायश्चित (अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृतिहोम) में "विधु', पाकयज्ञ (अर्थात् पाकांग होम, वृषोत्सर्ग, गृहप्रतिष्ठा आदि में) 'साहस', लक्षहोम में "वह्नि", कोटि होम में "हुताशन", पूर्णाहुति में "मृड", शान्ति में "वरद", पौष्टिक में "बलद", आभिचारिक में "क्रोधाग्नि", वशीकरण में "शमन", वरदान में "अभिदूषक", कोष्ठ में ...