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Showing posts from June, 2017

सूर्य नमस्कार

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योग दिवस के उपलक्ष्य में, वैसे तो योग सूत्र में पतञ्जली मुनी ने दुसरे सूत्र मे हि योग का लक्ष्य चित्तवृत्ती के निरोध को बताया हैं। 'अथयोगानुशासनम्' सूत्र के व्यास भष्य में 'योगः समाधी' कहा है भगवान व्यास ने तो यहाँ योग का अर्थ समाधी ही है। विना चित्त वृत्त निरोध के तो सामाधी साध्य भी नहि है। व्याकरण का अश्रय लें तो तीन धातुओं तिन तरह का अर्थ होता है। यहां योग के परम्परा तथा साधन भिन्न होने पर  भी साध्य एक ही हैं, वह है सामाधी । १.  युज् समाधौ- दिवादि गण ,समाधी अर्थ में। २.  युजिर् योगे-रुधादि गण, जोडने के अर्थ में। ३.  युज् संयमने- चुरादि गण, संयम करने के अर्थ में। यह तोयोग का सामान्य अर्थ हुअा ।अव सुर्य नमस्कार का सामन्या परिचय ।                      सूर्य नमस्कार।  योग  मे यम तथा नियमके बाद का अभीन्नअंग है जो की प्रथम सोपान भी कहा जा सकता है। यह असनों का ही समुच्चय है बारह प्रकार के आसनों द्वारा भगवान सुर्य देव का नमस्कार किया जाता हैं । जिस में सुक्ष्मता से लें तो विधीवत चक्रों मे...

साधना का रहस्य

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*" साधना का रहस्य "* मनुष्य का अन्तःकरण दर्पण की भाँति है। सुबह से साँझ तक इस पर धूल जमती रहती है। लगातार इस धूल के जमते रहने से अन्तःकरण का दर्पण अपने स्वाभाविक गुणों को गंवा देता है। और यह सच्चाई सर्वविदित है कि अन्तःकरण की अवस्था के अनुरूप ही मनुष्य को ज्ञान होता है। अन्तःकरण का दर्पण जिस मात्रा में स्वच्छ है, उस मात्रा में ही सत्य उसमें प्रतिबिम्बित होता है। सूफी सन्त जलालुद्दीन रुमी से किसी व्यक्ति ने अपनी मानसिक चंचलता का दुखड़ा रोया। उसकी परेशानी थी कि साधना में उसका मन एकाग्र नहीं होता। किसी भी तरह से उसका ध्यान नहीं जमता। रुमी ने मुस्कराते हुए उसे अपने एक मित्र साधु के पास यह कहकर भेजा- जाओ और उनकी समग्र दिनचर्या को बड़े ध्यान से देखो। वहीं तुम्हें साधना का रहस्य ज्ञात होगा। निर्देश के अनुसार वह व्यक्ति उस साधु के पास गया। वहाँ जाकर उसे भारी निराशा हुई। क्योंकि वह साधु एक साधारण सी सराय का रखवाला था। साथ ही वह स्वयं भी बहुत साधारण था। उसमें कोई ज्ञान के लक्षण भी दिखाई नहीं देते थे। हाँ, वह बहुत सरल और शिशुओं की भाँति निर्दोष मालूम पड़ता था। उसकी दिनचर्या भी सा...

शिवताण्डव स्तोत्रम्॥

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शिवभक्त रावणद्वारा रचित "शिव तांडव स्तोत्रम् " ॥ शिव तांडव स्तोत्रम् ॥ जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले,गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्। डमड्डमड्ड्मड्ड्मन्निनादवड्ड्मर्वयं,चकार चण्डताण्डवं तनोतु न: शिव:शिवम्॥ (1) जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी, विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्ध्दनि। धगध्दगध्दगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके, किशोरचन्द्रशेखरे रति: प्रतिक्षणं मम॥ (2) धराधरेन्द्ननन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर, स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुध्ददुर्धरापदि, क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥ (3) जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा, कदम्बकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे, मनोविनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥ (4) सहस्त्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर, प्रसूनधुलिधोरणीविधुसराङध्रिपीठभू:। भुजंगराजमा्लया निबध्दजाटजूटक:, श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखर:॥ (5) ललाटचत्वरज्वलध्दनञ्ज्यस्फुलिंगभा, निपीतपंचसायकं नमन्निलिम्पनायकम्। सुधामयुखलेखया विराजमान शेखरं, महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु न:॥ (6) करालभाल्पट्टिकाधगध्दगध्दगज्ज्वल, ध...

द्वादश श्रीहनुमन्नामः

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     हनुमानञ्जनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबल:। रामेष्ट: फाल्गुनसख: पिङ्गाक्षोऽमितविक्रम:।। उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशन:। लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।। एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मन:। स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च य: पठेत्।। तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भेवत्। राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन।। १.हनुमान ! Hanuman २ अंजनी सुनू ! Anjni Sunu ३.वायु पुत्र ! Vayu Putra ४.महाबल ! Mahabal ५. रामेष्ट ! Ramesht राम के प्रिय ६. फाल्गुन सख ! Phalgun Sakha अर्जुन के मित्र ७.पिंगाक्ष ! Pingaksh भूरे नेत्रवाले ८.अमित विक्रम ! Amit Vikram ९.उदधि क्रमण ! Udhikrman समुद्र को अतिक्रमण करने वाले १०.सीता सोक विनासन ! Sita Shock Vinashan ११.लक्ष्मण प्राण दाता ! Lakshman Pran Data १२ .दस ग्रीव दर्पहा ! Dash Grieve Darpha : रावण के घमंड को दूर करने वाले

शिव महिम्न स्तोत्रम् | Shiva Mahimna Stotra

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गन्धर्वराज पुष्पदन्त द्बारा किया गया, पुष्पदन्त के आराध्यदेव शंकर भगवान कि स्तुति है यह महिम्न स्तोत्र । शिव महिम्न स्तोत्रम् | Shiva Mahimna Stotra महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी । स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।। अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् । ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ।।१।। अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः । अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।। स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः । पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ।।२।। मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः । तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।। मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः । पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता ।।३।। तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत् । त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु ।। अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं । विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ।।४।। किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं । किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।। अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधियः । कुतर्कोऽयं कांश्च...

श्रीअादित्यहृदयस्तोत्रम्

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यह आदित्य हृदयस्तोत्र वालमिकीय रामायण के युद्धकाण्ड से उद्धृत है। भगवान श्रीराम जब रावण से युद्ध से थक कर जब युद्ध स्थल पर खडे थे,  उसी समय रावण युद्ध के लिए उपस्थित होता देख अगस्त्य मुनी जो की देवताओं के साथ युद्ध देखने आए थे, अगस्त्य मुनी ने भगवान श्रीराम को यह उपदेश किया था । जो की सभी शत्रुओं को नाश करने वाला तथा सरा विजय को देनेबाला तथा सभी मंगलों का मंगल, सुख देनेवाला, आयु तथा यश बढानेवाला उत्तम सनातन साधन का उपदेश किया॥ ''आदित्य हृदयस्तोत्र' में भगवान सूर्य के नामों से स्तुती हैं ॥'' विनियोग ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुपछन्दः, आदित्येहृदयभूतो भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः। ऋष्यादिन्यास ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुपछन्दसे नमः, मुखे। आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै नमः हृदि। ॐ बीजाय नमः, गुह्यो। रश्मिमते शक्तये नमः, पादयो। ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः नाभौ। करन्यास ॐ रश्मिमते अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः। ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ विवरवते अनाम...

श्री संङ्कष्टनाशनगणेशस्तोत्रम्

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श्रीनारद ऊवाच प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्। भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुष्कामार्थसिधये॥ प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्। तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥ लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च। सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धुम्रवर्णं तथाष्टकम्॥ नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्। एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥ द्वादशैतानि नामानि त्रिसध्यं यः पठेन्नरः। न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्॥ विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्। पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥ जपेद् गणपति स्तोत्रं षड्भिमासैः फलं लभेत्। संवत्सरेण सिद्धीं च लभते नात्र संशयः॥ अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्। तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः