सूर्य नमस्कार

योग दिवस के उपलक्ष्य में,
वैसे तो योग सूत्र में पतञ्जली मुनी ने दुसरे सूत्र मे हि योग का लक्ष्य चित्तवृत्ती के निरोध को बताया हैं। 'अथयोगानुशासनम्' सूत्र के व्यास भष्य में 'योगः समाधी' कहा है भगवान व्यास ने तो यहाँ योग का अर्थ समाधी ही है। विना चित्त वृत्त निरोध के तो सामाधी साध्य भी नहि है।
व्याकरण का अश्रय लें तो तीन धातुओं तिन तरह का अर्थ होता है। यहां योग के परम्परा तथा साधन भिन्न होने पर  भी साध्य एक ही हैं, वह है सामाधी ।
१. युज् समाधौ- दिवादि गण ,समाधी अर्थ में।

२. युजिर् योगे-रुधादि गण, जोडने के अर्थ में।

३. युज् संयमने- चुरादि गण, संयम करने के अर्थ में।

यह तोयोग का सामान्य अर्थ हुअा ।अव सुर्य नमस्कार का सामन्या परिचय ।

                    

सूर्य नमस्कार।
 योग  मे यम तथा नियमके बाद का अभीन्नअंग है जो की प्रथम सोपान भी कहा जा सकता है। यह असनों का ही समुच्चय है बारह प्रकार के आसनों द्वारा भगवान सुर्य देव का नमस्कार किया जाता हैं । जिस में सुक्ष्मता से लें तो विधीवत चक्रों में ध्यान तथा श्वास में भी नियन्त्रण के साथ हि सूर्य भगवान के नामों को ऊच्चारण करते हुए किया जाता हैं। विना नमोच्चारण का भी कर सकतें हैं।

                    
सूर्य नमस्कार समग्र शरीर के सम्यक व्यायाम है। यदि प्रति दिन बार्जह चक्र सूर्य नमस्कार किया जाए तो कोई भी ब्यायाम आवश्यक नाही पडेगा । यदि श्वास प्रश्वास के साथ किया तो सोने पर सुगन्ध होगा, जब की सुर्य नमस्कार करने में केवल १ मिनट से भी कम समय लगता है, बारह चक्र करने में केवल १२मिनट लगेगा।
 यहाँ श्वास का क्रम थोडा अलग भी करतें जो की नमस्कार मुद्रा१ में रेचक करना अर्धचक्रासन२ में पूरक, ३हस्तपादासन में रेचक, ४.एपादप्रसारान में पुनः पुरक ५द्वीपादप्रसारासन( दण्डासन) में रेचक ईसि तरह पूरक रेचक चलते रहेगा।

सूर्य भगवान के बारह नाम, तथा ध्यान चक्र,अासन, तथा स्वास प्रकृया ।

१. ॐ मित्राय नमः,अनाहत चक्र में ध्यान। नमस्कार मुद्रा, रेचक या समान्य स्वासप्रश्वास। पहला और बारहवाँ एक  ही होता है।

२. ॐ रवये नमः,विशुद्ध चक्र।अर्धचक्रासन, पुरक करते हुए स्थिर रहना कुम्भक करना।दुसरा और ग्यरहवाँ का  समान होता है।


३. ॐ सूर्याय नमः, मुलाधार चक्र। हस्तपादासन, स्वास छोडते हुए(रेचक)असन पुर्ण होने के बाद कुम्भक । तिसरा तथा दशवाँ एक हि होगा।

४. ॐ खगाय नमः,आज्ञा चक्र। एकपाद प्रसारासन। पूरक करतेहुए स्थिर होना यानी कुम्भक करना। चौंथा तथा नौवाँ एक समान होता है ।

 
५. ॐ पुष्णे नमः,  विशुद्धि चक्र। द्विपाद प्रसारासन या दण्डासान, रेचक करते हुए समान्य स्वास।

. ॐ हिरर्ण्यगर्भाय नमः, स्वाधिष्ठान चक्र। अष्टाङ्गनमनासन, सामान्य स्वास के बाद रेचक।

७. ॐ मारिचये नमः, मुलाधार चक्र। भुजंगासन।स्वास भरते हुए (पूरक) करना।
 
८. ॐ आदित्याय नमः, विशुद्धि चक्र। पर्वतासन, रेचक स्वास छोडना।


९. ॐ मारिचये नमः,आज्ञा चक्र। एकपाद प्रसारासन(पहले४नं. में जो पैर पिछे लीए थे उसे अागे लाना तथा दुसरे पैर को पिछे ले जाना ) स्वास पूरक।४ कि तरह।

१०.ॐ सावित्रे नमः, मुलाधार चक्र। हस्तपादासन,रेचक करते हुए कुम्भक करना।३ की तरह।

११.ॐअर्काय नमः, विशुद्धि चक्र।अर्धचक्रासन, स्वास पूरक।२कि तरह।

१२.ॐ भस्कराय नमः,अनाहत चक्र। नामस्कारमुद्रा, रेचक या सामान्य स्वास प्रश्वास।

#करो_योग_रहो_निरोग



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