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जय शिवशंकर जय गंगाधर करूणाकर करतार हरे।

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जय शिवशंकर जय गंगाधर करूणाकर करतार हरे। जय शिवशंकर जय गंगाधर करूणाकर करतार हरे। जय कैलाशी जय अविनाशी सुखराशी सुखसार हरे। जय शशिशेखर जय डमरूधर जय जय प्रेमागार हरे। जय त्रिपुरारी जय मदहारी नित्य अनन्त अपार हरे। निर्गुण जय जय सगुण अनामय निराकार साकार हरे। पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।   जय रामेश्वर जय नागेश्वर वैद्यनाथ केदार हरे। मल्लिकार्जुन सोमनाथ जय महाकार ओंकार हरे। जय त्रयम्बकेश्वर जय भुवनेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे। काशीपति श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अधहार हरे। नीलकंठ जय भूतनाथ जय मृतुंजय अविकार हरे। पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।   भोलानाथ कृपालु दयामय अवढर दानी शिवयोगी। निमिष मात्र में देते है नवनिधि मनमानी शिवयोगी। सरल हृदय अति करूणासागर अकथ कहानी शिवयोगी। भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर बने मसानी शिवयोगी। स्वयं अकिंचन जन मन रंजन पर शिव परम उदार हरे। पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।   आशुतोष इस मोहमयी निद्रा मुझे जगा देना। विषय वेदना से विषयों की मायाधीश छुड़ा देना। रूप सुधा की एक बूद से जीवन मुक्त बना देना। दिव्य ...

वानप्रास्थ

आपको याद है न... श्रीमद्भागवतमहापुराण के प्रथम स्कंध के तेरहवें अध्याय में विदुर धृतराष्ट्र को वानप्रस्थ हेतु प्रेरित करते हुए कहते हैं कि--- तस्यापि तव देहो$यं कृपणस्य जिजीविषो:। परैत्यनिच्छतो जीर्णो जरया वाससी इव।।(1/13/24) अर्थात् आप अब भी जीना चाहते हैं! परन्तु आपके चाहने से क्या होगा, पुराने वस्त्र की तरह बुढ़ापे से गला हुआ शरीर आपके न चाहने पर भी क्षीण हुआ जा रहा है। सच कहूँ तो इस शरीर के प्रति उद्भूत चाहना अथवा उपेक्षा, सम्मान अथवा द्वेष आदि मनोभावों से मैं मुक्त हूँ, तभी तो आपके प्रति मन की साधना में रत रहती हूँ। शरीर के आकर्षण-प्रकर्षण सन्दर्भित वर्णनाभिव्यक्ति तो इस प्रेम-साधना की एक स्थूल अवस्था मात्र है, मन की उन्मुक्तता का ही शब्द-शब्द निदर्शन है। शरीर षडभावविकारों में  ही चलायमान वस्तु है, अब मैं पहले आपको षडभाव समझाऊँ... शरीर की छह अवस्था होती है, जायते=यह उत्पन्न होता है। अस्ति= यह शरीर है... विद्यमानता है। वर्धते=यह बढ़ता है आयु क्रम में। विपरिणमते= बढ़ती उम्र के परिणाम दीखते हैं शरीर पर। अपक्षीयते=वृद्धावस्था में, रुग्णावस्था में क्षरण भी होता है इस शरीर का। ...