वानप्रास्थ
आपको याद है न... श्रीमद्भागवतमहापुराण के प्रथम स्कंध के तेरहवें अध्याय में विदुर धृतराष्ट्र को वानप्रस्थ हेतु प्रेरित करते हुए कहते हैं कि---
तस्यापि तव देहो$यं कृपणस्य जिजीविषो:।
परैत्यनिच्छतो जीर्णो जरया वाससी इव।।(1/13/24)
अर्थात् आप अब भी जीना चाहते हैं! परन्तु आपके चाहने से क्या होगा, पुराने वस्त्र की तरह बुढ़ापे से गला हुआ शरीर आपके न चाहने पर भी क्षीण हुआ जा रहा है।
सच कहूँ तो इस शरीर के प्रति उद्भूत चाहना अथवा उपेक्षा, सम्मान अथवा द्वेष आदि मनोभावों से मैं मुक्त हूँ, तभी तो आपके प्रति मन की साधना में रत रहती हूँ। शरीर के आकर्षण-प्रकर्षण सन्दर्भित वर्णनाभिव्यक्ति तो इस प्रेम-साधना की एक स्थूल अवस्था मात्र है, मन की उन्मुक्तता का ही शब्द-शब्द निदर्शन है। शरीर षडभावविकारों में ही चलायमान वस्तु है, अब मैं पहले आपको षडभाव समझाऊँ... शरीर की छह अवस्था होती है, जायते=यह उत्पन्न होता है। अस्ति= यह शरीर है... विद्यमानता है। वर्धते=यह बढ़ता है आयु क्रम में। विपरिणमते= बढ़ती उम्र के परिणाम दीखते हैं शरीर पर। अपक्षीयते=वृद्धावस्था में, रुग्णावस्था में क्षरण भी होता है इस शरीर का। विनश्यति=यह शरीर विनाशी है। इन्हीं भावविकारों में बंधे शरीर में कभी-कभी क्रमभंग भी दिखता है, मन इन भावविकारों से मुक्त है तभी तो शरीर के विनाश के बाद भी मन बहुतों के मन में समाहित रहता है, हाँ! प्रायः मनुष्य मन को शरीर-समाज-मान्यता अथवा इन सबके विरुद्ध चलाने की कोशिश करता है, कभी-कभी सफल भी हो जाता है। खैर! मैं अपनी बताऊँ तो उपनिषदों ने मुझे हमेशा आकृष्ट किया... गीता द्वितीय अध्याय तो बाल्यकाल से ही कण्ठस्थ रहा..., परिणामतः मन-बुद्धि-ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय में सूक्ष्म पार्थक्य को समझकर जीना ही वैचारिक सूत्र रहे हैं।
विदुर ने धृतराष्ट्र को बहुत समझाया है...., समझाने का प्रचलन पारम्परिक है देश में, स्वतः समझने के गुण विकसित हों ऐसा दुर्लभ समझिए! तो विदुर कह रहे थे--
गतस्वार्थमिमं देहं विरक्तो मुक्तबन्धन:।
अविज्ञातगतिर्जह्यात् स वै धीर उदाहृत:।।(1/13/25)
जब शरीर से स्वार्थ सधने की उम्मीद न रह जाय तो बन्धनों से मुक्त हो जाना ही श्रेयस्कर है, जो संसार के सम्बन्धियों से अलग रहकर उनकी न जानकारी में अपने शरीर का त्याग करता है, वही धीर कहा गया है।
शरीर स्वार्थ-साधना हेतु निमित्त मात्र है, जो मन को शीघ्रातिशीघ्र आनन्दित कर दे ऐसे ही कार्यों के लिए हम शरीर का उपयोग करते रहते हैं, कर्मेन्द्रियों को ज्ञानेन्द्रियों की सेविका बना कर रखना मानव स्वभाव है, मन के अनुकूल ज्ञानेन्द्रिय संचालित होती है... जो भी ज्ञानेन्द्रीय को भाए उसी निमित्त शरीर यंत्रवत कार्यरत रहता है। जीवन के अपक्षरण काल में शरीर की कार्य-क्षमता-कुशलता शिथिल होने लगती है... आँखों की ज्योति खूबसूरत दृश्य सहेजने में विफल हो जाती है, ठहर हुआ अक्षम हाथ-पैर युक्त शरीर वीर रस की कविताओं में ओज नहीं महसूसता क्योंकि प्रायः मन को हम शरीर से बांधकर ही रखते और महसूसते हैं। मन को समग्र बन्धनों से मुक्त रखना चाहिए न... इसीलिए मैं भीड़ में भी अकेली रहती हूँ... अकेले रहते हुए ही आपके एहसासों के मेले में आनन्दित हूँ।
विदुर के समझाने से दृष्टिबाधित धृतराष्ट्र की प्रज्ञादृष्टि उन्मीलित हुई थी, आपके मिलने के बाद ही मेरे वैराग्यपूर्ण जीवन में सांसारिकता से इतर एक अनुपम सौंदर्य आविर्भूत हुआ है...... नया संसार बसा है.....
डाॅ. कल्पना दीक्षित
Comments
Post a Comment