सरस्वत्यष्टकम्

।। सरस्वती अष्टकम्।।

रवि-रुद्र-पितामह-विष्णु-नुतं, हरि-चन्दन-कुंकुम-पंक-युतम् !

मुनि-वृन्द-गजेन्द्र-समान-युतं, तव नौमि सरस्वति! पाद-युगम्।।


शशि-शुद्ध-सुधा-हिम-धाम-युतं, शरदम्बर-बिम्ब-समान-करम्।

बहु-रत्न-मनोहर-कान्ति-युतं, तव नौमि सरस्वति! पाद-युगम्।। 


कनकाब्ज-विभूषित-भूति-पवं, भव-भाव-विभावित-भिन्न-पदम्।

प्रभु-चित्त-समाहित-साधु-पदं, तव नौमि सरस्वति! पाद-युगम्।। 


भव-सागर-मज्जन-भीति-नुतं, प्रति-पादित-सन्तति-कारमिदम्।

विमलादिक-शुद्ध-विशुद्ध-पदं, तव नौमि सरस्वति! पाद-युगम्।। 


मति-हीन-जनाश्रय-पारमिदं, सकलागम-भाषित-भिन्न-पदम्।

परि-पूरित-विशवमनेक-भवं, तव नौमि सरस्वति! पाद-युगम्।। 


परिपूर्ण-मनोरथ-धाम-निधिं, परमार्थ-विचार-विवेक-विधिम्।

सुर-योषित-सेवित-पाद-तलं, तव नौमि सरस्वति! पाद-युगम्।। 


सुर-मौलि-मणि-द्युति-शुभ्र-करं, विषयादि-महा-भय-वर्ण-हरम्।

निज-कान्ति-विलोमित-चन्द्र-शिवं, तव नौमि सरस्वति! पाद-युगम्।। 


गुणनैक-कुल-स्थिति-भीति-पदं, गुण-गौरव-गर्वित-सत्य-पदम्।

कमलोदर-कोमल-पाद-तलं,तव नौमि सरस्वति! पाद-युगम्।।


त्रिसंध्यं यो जपेन्नित्यं, जले वापि स्थले स्थितः। 

पाठ-मात्रे भवेत् प्राज्ञो, ब्रह्म-निष्ठो पुनः पुनः॥

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